मजरूह सुल्तानपुरी
1919-2000
असरार उल हसन ख़ान मजरूह सुल्तानपुरी उर्दू शायर और हिन्दी फ़िल्मों के गीतकार थे।
दीवान पढ़ें (Read Diwan)
Famous Works
आ निकल के मैदाँ में दोरुख़ी के ख़ाने से
काम चल नहीं सकता अब किसी बहाने से
आखिर ग़मे-ज़ाना को ऐ दिल बढ़ के ग़मे-दौराँ होना था
इस क़तरे को बनाना था दरिया इस मौज को तूफ़ाँ होना था
आसमाँ के नीचे, हम आज अपने पीछे
प्यार का जहाँ, बसा के चले
इक दिन बिक जाएगा, माटी के मोल
जग में रह जाएंगे, प्यारे तेरे बोल
इक लड़की भीगी\-भागी सी
सोती रातों को जागी सी
इतना हुस्न पे हुज़ूर ना ग़ुरूर कीजिए
दिल के मारों का ख़्याल कुछ ज़रूर कीजिए
इन बहारों में अकेले न फिरो
राह में काली घटा रोक न ले
इन्हीं लोगों ने, इन्हीं लोगों ने
इन्हीं लोगों ने ले लीना दुपट्टा मेरा
उठेगी तुम्हारी नज़र धीरे-धीरे
मुहब्बत करेगी असर धीरे-धीरे
ऐसे न मुझे तुम देखो
सीने से लगा लूँगा
ओ मेरे, दिल के चैन,
चैन आए मेरे दिल को दुआ कीजिये
ओ मेरे सोना रे! सोना रे! सोना रे !
दे दूँगी जान जुदा मत होना रे
(ओ हँसनी मेरी हँसनी, कहाँ उड़ चली
मेरे अरमानो के पँख लगाके, कहाँ उड़ चली)\- २
रफ़ी: ओ हसीना ज़ुल्फ़ों वाली जानेजहाँ
ढूँढती हैं काफ़िर आँखें किसका निशां
कब तक मलूँ जबीं से उस संग-ए-दर को मैं
ऐ बेकसी संभाल, उठाता हूँ सर को मैं
कभी आर कभी पार लागा तीर\-ए\-नज़र
सैंया घायल किया रे तू ने मेरा जिगर
कभी तो मिलेगी, कहीं तो मिलेगी
बहारों की मंज़िल राही
कहीं करती होगी, वो मेरा, इंतज़ार
जिसकी तमन्ना में, फिरता हूँ बेक़रार
कहीं बेख़याल होकर, यूँ ही छू लिया किसी ने
कई ख्वाब देख डाले, यहाँ मेरी बेखुदी ने
कोई जब राह न पाए, मेरे संग आए
के पग पग दीप जलाए, मेरी दोस्ती मेरा प्यार
क्या हुआ तेरा वादा, वो क़सम वो इरादा (२)
भूलेगा दिल, जिस दिन तुम्हें
ख़त्म-ए-शोर-ए-तूफ़ाँ था दूर थी सियाही भी
दम के दम में अफ़साना थी मेरी तबाही भी
ख़्वाब हो तुम या कोई हक़ीक़त
कौन हो तुम बतलाओ
किशोर: गुम है किसी के प्यार में, दिल सुबह शाम
पर तुम्हें लिख नहीं पाऊँ, मैं उसका नाम
चला जाता हूँ, किसी की धुन में
धड़कते दिल के, तराने लिये
चलो सजना जहाँ तक घटा चले
लगाकर मुझे गले
चाहूँगा मैं तुझे साँझ सवेरे
फिर भी कभी अब नाम को तेरे
चुरा लिया है तुम ने जो दिल को
नज़र नहीं चुराना सनम
छलकाएं जाम आइये आपकी आँखों के नाम
होंठों के नाम
आ: छोड़ दो आंचल ज़माना क्या कहेगा
छोड़ दो आंचल ज़माना क्या कहेगा
जब तक रहे तन में जिया वादा रहा, ओ साथिया
हम तुम्हारे लिये तुम हमारे लिये
जला के मशअ़ले-ए-जां हम जुनूं सिफ़ात चले
जो घर को आग लगाए हमारे साथ चले
झुका-झुका के निगाहें मिलाए जाते हैं
बचा-बचा के निशाने लगाए जाते हैं
चाँदनी रात बड़ी देर के बाद आई है
ये मुलाक़ात बड़ी देर के बाद आई है