ग़ज़ल

झुका-झुका के निगाहें मिलाए जाते हैं

मजरूह सुल्तानपुरी · सब कलाम देखें
झुका-झुका के निगाहें मिलाए जाते हैंबचा-बचा के निशाने लगाए जाते हैंहुज़ूर जब से मेरे दिल पे छाए जाते हैंये हाल है कि क़दम डगमगाए जाते हैं
हमें तो आपकी इस अदा ने लूट लियानज़र उठाते नहीं मुस्कुराए जाते हैंजिन्हें हो इश्क़ ज़ुबाँ से वो कुछ नहीं कहतेये आप हैं कि मोहब्बत जताए जाते हैं
हमीं से सीखी अदाएँ हमीं पे वार कियाहमारे तीर हमीं पर चलाए जाते हैंहुज़ूर को मैं दीवाना कहूँ तो फिर क्या होकि बिन बुलाए मेरे घर में आए जाते हैं
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