ग़ज़ल

ख़्वाब हो तुम या कोई हकीकत

मजरूह सुल्तानपुरी · सब कलाम देखें
ख़्वाब हो तुम या कोई हक़ीक़तकौन हो तुम बतलाओदेर से कितनी दूर खड़ी होऔर करीब आ जाओ
सुबह पे जिस तरह, शाम का हो गुमार \- (२)ज़ुल्फ़ों में एक चेहरा, कुछ ज़ाहिर कुछ निहार
धड़कनों ने सुनी, एक सदा पाओं की \- (२)और दिल पे लहराई, आँचल की छाओं सी
मिल ही जाती हो तुम, मुझको हर मोड़ पे \- (२)चल देती हो कितने, अफ़साने छोड़ के
फिर पुकारो मुझे, फिर मेरा नाम लो \- (२)गिरता हूँ फिर अपनी, बाहों में थाम लो
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh