ग़ज़ल
कहीं बेख़याल होकर, यूँ ही छू लिया किसी ने
कहीं बेख़याल होकर, यूँ ही छू लिया किसी नेकई ख्वाब देख डाले, यहाँ मेरी बेखुदी नेकहीं बेख़याल होकर
मेरे दिल मैं कौन है तू, कि हुआ जहाँ अन्धेरावहीं सौ दिये जलाये, तेरे रुख़ की चाँदनी नेकई ख्वाब, कई ख्वाब देख डाले यहाँ मेरी बेखुदी नेकहीं बेख़याल होकर
कभी उस परी का है कुछ, कभी इस हसीं की महफ़िलमुझे दरबदर फिराया, मेरे दिल की सादगी नेकई ख्वाब, कई ख्वाब देख डाले यहाँ मेरी बेखुदी नेकहीं बेख़याल होकर
है भला सा नाम उसका, मैं अभी से क्या बताऊंकिया बेक़रार हँसकर, मुझे एक आदमी नेकई ख्वाब, कई ख्वाब देख डाले यहाँ मेरी बेखुदी नेकहीं बेख़याल होकर
अरे मुझपे नाज़ वालों, ये नयाज़मन्दियां क्योंहै यही करम तुम्हारा, तो मुझे ना दोगे जीनेकई ख्वाब, कई ख्वाब देख डाले यहाँ मेरी बेखुदी नेकहीं बेखयाल होकर
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