ग़ज़ल

चलो सजना, जहाँ तक घटा चले

मजरूह सुल्तानपुरी · सब कलाम देखें
चलो सजना जहाँ तक घटा चलेलगाकर मुझे गलेचलो सजना जहाँ तक घटा चले
सुंदर सपनों की है मंज़िल कदम के नीचेफ़ुर्सत किसको इतनी, देखे जो मुड़के पीछेतुम चलो हम चलें, हम चलें तुम चलोसावन की हवा चलेचलो सजना जहाँ...
धड़कन तुमरे दिलकी, उलझी हमारी लट मेंतुमरे तन की छाया, काजल बनी पलक मेंएक हैं दो बदन, दो बदन एक हैंआँचल के तले\-तलेचलो सजना जहाँ...
पत्थरीली राहों में तुम संग मैं झूम लूँगीखाओगे जब ठोकर, होंठों से चूम लूँगीप्यार का आज से, आज का प्यार सेहमसे सिलसिला चलेचलो सजना जहाँ...
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