ग़ज़ल

कभी तो मिलेगी, कहीं तो मिलेगी

मजरूह सुल्तानपुरी · सब कलाम देखें
कभी तो मिलेगी, कहीं तो मिलेगीबहारों की मंज़िल राहीबहारों की मंज़िल राही ...
लम्बी सही दर्द की राहेंदिल की लगन से काम लेआँखों के इस तूफ़ाँ को पी जाआहों के बादल थाम लेदूर तो है पर, दूर नहीं हैनज़ारों की मंज़िल राहिबहारों की मंज़िल राही ...
आ हा हा हा, ल ला, ला ल ल, अह हा हा ह ह
माना कि है गहरा अन्धेरागुम है डगर की चाँदनीमैली न हो धुँधली पड़े नदेख नज़र की चाँदनीडाले हुए है, रात की चादरसितारों की मंज़िल राहीबहारों की मंज़िल राही ...
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