ग़ज़ल

आ निकल के मैदां में दोरुख़ी के ख़ाने से

मजरूह सुल्तानपुरी · सब कलाम देखें
आ निकल के मैदाँ में दोरुख़ी के ख़ाने सेकाम चल नहीं सकता अब किसी बहाने से
अहदे-इन्कि़लाब आया, दौरे-आफ़ताब आयामुन्तज़िर थीं ये आंखें जिसकी इक ज़माने से
अब ज़मीन गाएगी हल के साज़ पर नग़्मेवादियों में नाचेंगे हर तरफ़ तराने-से
अहले-दिल उगाएँगे ख़ाक से महो-अंजुमअब गुहर सुबक होगा जौ के एक दाने से
मनचले गुनेंगे अब रंगो-बू के पैराहनअब संवर के निकलेगा हुस्‍न कारख़ाने से
आ़म होगा अब हमदम सब पे फ़ैज़ फ़ितरत काभर सकेंगे अब दामन हम भी इस ख़ज़ाने से
सुनते हम तो क्या सुनते इक बुज़ुर्ग की बातेंसुबह को इलाक़ा क्या शाम के फ़साने से
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh