ग़ज़ल
ख़त्म-ए-शोर-ए-तूफ़ाँ
ख़त्म-ए-शोर-ए-तूफ़ाँ था दूर थी सियाही भीदम के दम में अफ़साना थी मेरी तबाही भी
इल्तफ़ात समझूँ या बेरुख़ी कहूँ इस कोरह गई ख़लिश बन कर उसकी कमनिगाही भी
याद कर वो दिन जिस दिन तेरी सख़्तगीरी परअश्क भर के उठी थी मेरी बेगुनाही भी
शमा भी उजाला भी मैं ही अपनी महफ़िल कामैं ही अपनी मंज़िल का राहबर भी राही भी
गुम्बदों से पलटी है अपनी ही सदा "मजरूह"मस्जिदों में की जाके मैं ने दादख़्वाही भी
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