ग़ज़ल

कब तक मलूँ जबीं से

मजरूह सुल्तानपुरी · सब कलाम देखें
कब तक मलूँ जबीं से उस संग-ए-दर को मैंऐ बेकसी संभाल, उठाता हूँ सर को मैं
किस किस को हाय, तेरे तग़ाफ़ुल का दूँ जवाबअक्सर तो रह गया हूँ, झुका कर नज़र को मैं
अल्लाह रे वो आलम-ए-रुख्सत कि देर तकतकता रहा हूँ यूँ ही तेरी रेहगुज़र को मैं
ये शौक़-ए-कामयाब, ये तुम, ये फ़िज़ा, ये रातकह दो तो आज रोक दूँ बढ़कर सहर को मैं
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