ग़ज़ल

उठेगी तुम्हारी नज़र धीरे-धीरे

मजरूह सुल्तानपुरी · सब कलाम देखें
उठेगी तुम्हारी नज़र धीरे-धीरेमुहब्बत करेगी असर धीरे-धीरे
ये माना ख़लिश है अभी हल्की-हल्कीख़बर भी नहीं है तुम को मेरे दर्द-ए-दिल कीकहबर हो रहेगी मगर धीरे-धीरेउठेगी तुम्हारी नज़र ...
मिलेगा जो कोई हसीं चुपके-चुपकेमेरी याद आ जाएगी वहीं चुपके-चुपकेसताएगा दर्द-ए-जिगर धीरे-धीरेउठेगी तुम्हारी नज़र ...
सुलगते हैं कब से इसी चाह में हमपड़े हैं निगाहें डाले इसी राह में हमकि आओगे तुम भी इधर धीरे-धीरेउठेगी तुम्हारी नज़र ...
(फ़िल्म -- ’एक राज़’ - 1963)
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