ग़ज़ल

कभी आर कभी पार लागा तीर-ए-नज़र

मजरूह सुल्तानपुरी · सब कलाम देखें
कभी आर कभी पार लागा तीर\-ए\-नज़रसैंया घायल किया रे तू ने मेरा जिगरकभी आर कभी पार ...
पहले मिलन में ये तो दुनियाँ की रीत हैबात में गुस्सा लेकिन दिल ही दिल में प्रीत हैमन ही मन में लड्डू फूटेनैनों से फुल्झड़ियाँ छूटेहोंठों पर तक़रारकभी आर कभी पार ...
देखती रह गयी मैं तो जिया तेरा हो गयामारा ऐसा तीर नज़र कादर्द मिला ये जीवन भर कालूटा चैन क़रारकभी आर कभी पार ...
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