पद्माकर

पद्माकर

1753-1833
दीवान पढ़ें (Read Diwan)

Famous Works

अँचल के ऎँचे चल करती दॄगँचल को ,चंचला ते चँचल चलै न भजि द्वारे को ।
अधखुली कँचुकी उरोज अध आधे खुले ,अधखुले बैष नख रेखन के झलकैं ।
आई खेलि होरी, कहूँ नवल किसोरी भोरी,बोरी गई रंगन सुगंधन झकोरै है ।
आई संग आलिन के ननद पठाई नीठि,सोहत सोहाई सीस ईड़री सुपट की.
आजु दिन कान्ह आगमन के बधाए सुनि ,छाए मग फूलन सुहाए थल थल के ।
आरस सोँ आरत सँभारत न सीस पट ,गजब गुजारत गरीबन की धार पर ।
आरस सोँ रस सोँ पदमाकर चौँकि परै चख चुँबन के किये ।पीक भरी पलकैँ झलकैँ अलकैँ छवि छूटि छटा लिये ।
आली हौँ गई ही आज भूलि बरसाने कहूँ ,तापै तू परै है पदमाकर तनैनी क्योँ ।
ए अलि हमेँ तो बात गात की न जानि परै ,बूझत न काहे वामे कौन कठिनाई है ।
एकै सँग हाल नँदलाल औ गुलाल दोऊ,दृगन गये ते भरी आनँद मढै नहीँ ।
एहो नंदलाल! ऐसी व्याकुल पड़ी है वाल,हाल ही चलौ तौ चलौ ,जोरे जुरि जायगी.
ऐ ब्रजचन्द गोविंद गोपाल ! सुन्यो क्यों न एते कमाल किए मैं .त्यों पद्माकर आनंद के नद हौ, नन्द नंदन ! जानि लिए मैं .
ओप भरी कंचुकी उरोजन पर ताने कसी,लागी भली भाई सी भुजान कखियाँन में
औरे भांति कुंजन में गुंजरत भौर भीर,:::औरे भांति बौरन के झौरन के ह्वै गए.
कबहूं फिर पांव न देहौं लला, भजि जैहौं तहां जहां सूधी सहौ ।पदमाकर देहरी द्वार किवार लगे ललचैहौ न ऎसी चहौ ।
कूरम पै कोल कोल हू पै सेष कुंडली है,कुंडली पै फबी फैल सुफन हजार की.
कूलन में केलि में कछारन में कुंजन मेंक्यारिन में कलिन में कलीन किलकंत है.
कै रति रँग थकी थिर ह्वै परजँक पै प्यारी परी सुख पाय कै ।त्योँ पदमाकर स्वेद के बुँद रहे मुकताहल से छवि छाय कै ।
खाये पान बीरी सी बिलोचन विराजैँ आज ,अँजन अंजाये अधराधर अमी के हैँ ।
गँजन सुगुँज लग्यो तैसो पौन पुँज लग्यो ,दोस मनि कुँज लग्यो गुँजन सोँ गजि कै ।
गुलगुली गिलमैं गलीचा है गुनीजन हैं,चाँदनी हैं चिक हैं चिरागन की माला है.
गोकुल के,कुल के,गली के,गोप गाँवन के,जौ लगि कछू को कछू भाखत भनै नहीं .
घर ना सुहात ना सुहात बन बाहिर हू ,बाग ना सुहात जो खुसाल खुसबोही सोँ ।
घूंघट की धूम के सुझूम के जवाहिर के ,झिलमिल झालर की भूमि लौं झुलत जात ।
चपला चमाकैं चहु ओरन ते चाह भरीचरजि गई ती फेरि चरजन लागी री ।
चहचही चुभकैँ चुभी हैँ चौँक चुँबन की ,लहलही लांबी लहैँ लटकी सुलँक पर ।
चालो सुनि चन्द्रमुखी चित्त में सुचैन करि,तित बन बागन घनेरे अलि घूमि रहे.
चाह भरो चंचल हमारो चित्त नौल बधू ,तेरी चाल चँचल चितौनि मे बसत है ।
जग जीवन को फल जानि परयो ,धनि नैनन को ठहरैयत हैँ ।पदमाकर हयो हुलसै पुलकै, तन सिंधु-सुधा के अन्हैयत हैँ ।
फूलन के खंभा पाट-पटरी सुफूलन की,फूलन के फँदना फँदे हैं लाल डोरे में ।
जाहिरै जागति सी जमुना जब बूडै बहै उमहै बह बेनी ।त्योँ पदमाकर हीरा के हारनि गँग तरँगनि सी सुख देनी ।
तालन पै ताल पै तमालन पै मालन पै,:::बृन्दावन बीथिन बहार बंसीबट पै.
तीखे तेगवाही जे सिलाही चढे घोड़न पै,स्याही चढे अमित अरिंदन की ऐल पै.
दाहन ते दूनी, तेज तिगुनी त्रिसूल हूं ते,चिल्लिन ते चौगुनी, चालाक चक्रवाती मैं।
दूरि ही ते देखति दसा मैँ वा वियोगिनि की ,आई दौरि भाजि ह्यां न लाज मढि आवैगी ।
छुटी न गाँठ जु राम सों, तियन कहो तिहि ठाँहिं ।सियकंकन को छोरबो धनुष तोरबो नाहिं ।।
फागु के भीर अभीरन तें गहि, गोविंदै लै गई भीतर गोरी ।भाय करी मन की पदमाकर, ऊपर नाय अबीर की झोरी ॥
बोलति न काहे ! एरी, पूछे बिन बोलोँ कहा ,पूछती हौँ काहे भई स्वेद अधिकाई है ।
मल्लिक न मंजुल मलिंद मतवारे मिले,:::मंद मंद मारुत मुहीम मनसा की है.
मीनागढ़ बंबई सुमंद मंदराज बंग,बंदर को बंद करि बंदर बसावैयो.
मोहिं लखि सोवत बिथोरिगो सुबेनी बनी,तोरिगो हिय को हार,छोरिगो सुगैया को.
ये नन्दगांव ते आये इहां उत आई सुता वह कौनहू ग्वाल की ।त्यों पदमाकर होत जुराजुरी दौउन फाग करी इहि ख्याल की ।
लै पटपीत भले पहिरे पहिराय पियै चुनि चूनरि खासी ।त्योँ पदमाकर साँझहिते सिगरी निसि केलि कला परगासी।
सम्पति सुमेर की कुबेर की जो पावै ताहि,:::तुरंत लुटावत बिलम्ब उर धारै ना.
सुँदर सुरँग अँग शोभित अनँग रँग ,अँग अंग फैलत तरंग परिमल के ।
सोभित स्वकीया गनगुन गिनती मे तहाँ ,तेरे नाम ही की एक रेखा रेखियतु है ।
सोसनी दुकूलनि दुराये रूप रोसनी है ,बूटेदार घाँघरी की घूमनि घुमाइ कै ।
सौ दिन को मारग तहाँ की बिदा माँगी पिया ,प्यारो पदमाकर प्रभात राति बीते पर ।