ग़ज़ल
जाहिरै जागति सी जमुना जब बूडै बहै
जाहिरै जागति सी जमुना जब बूडै बहै उमहै बह बेनी ।त्योँ पदमाकर हीरा के हारनि गँग तरँगनि सी सुख देनी ।पाँयन के रँग सोँ रंगि जाति सी भाँतिहि भाँति सरस्वति सेनी ।पैर जँहाई जहाँ वह बाल तँहा तहाँ ताल मे होत त्रिवेनी ।
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