ग़ज़ल
सौ दिन को मारग तहाँ की बिदा माँगी पिया
सौ दिन को मारग तहाँ की बिदा माँगी पिया ,प्यारो पदमाकर प्रभात राति बीते पर ।सो सुनि पियारी पिय गमन बराइबे को ,आंसुन अन्हाइ बैठी आसन सुतीते पर ।बालम बिदेसै तुम जात हौ तो जाउ पर ,साँची कहि जाउ कब ऎहौ भौन रीते पर ।पहर कै भीतर कै दोपहर भीतर ही ,तीसरे पहर केधौँ साँझ ही बितीते पर ।
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