ग़ज़ल
गोकुल के कुल के गली के गोप गाँवन के
गोकुल के,कुल के,गली के,गोप गाँवन के,जौ लगि कछू को कछू भाखत भनै नहीं .कहै पद्माकर परोस पिछ्वारन के,द्वारन के दौरे गुन औगुन गनै नहीं.तौं लौं चलि चातुर सहेली!याही कोद कहूँ,नीके कै निहारै ताहि,भरत मनै नहीं.हौं तौ श्याम रंग में चोराई चित चोराचोरी,बोरत तौ बोरयो,पै निचोरत बनै नहीं.
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