ग़ज़ल

सुँदर सुरँग अँग शोभित अनँग रँग

पद्माकर · सब कलाम देखें
सुँदर सुरँग अँग शोभित अनँग रँग ,अँग अंग फैलत तरंग परिमल के ।बारन के भार सुकुमार को लचत अंक,राजत प्रयँक पर भीतर महल के ।कहै पदमाकर बिलोकि जन रीझैँ जाहिँ,अँबर अमल के सकल जल थल के ।कोमल कमल के गुलाबन के दलके सु,जात गडि पांयन बिछौना मखमल के ।
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