ग़ज़ल
घर ना सुहात ना सुहात बन बाहिर हू
घर ना सुहात ना सुहात बन बाहिर हू ,बाग ना सुहात जो खुसाल खुसबोही सोँ ।कहै पदमाकर घनेरे घन घाम त्यों ही ,चैत न सुहात चाँदनी हू जोग जो ही सोँ ।साँझहू सुहात न सुहात दिन मौझ कछू ,व्यापी यह बात सो बखानत हौँ तोही सौं ।राति हू सुहात न सुहात परभात आली ,जब मन लागि जात काहू निरमोही सौँ ।
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