ग़ज़ल

अधखुली कँचुकी उरोज अध आधे खुले

पद्माकर · सब कलाम देखें
अधखुली कँचुकी उरोज अध आधे खुले ,अधखुले बैष नख रेखन के झलकैं ।कहैं पदमाकर नवीन अध नीबी खुली ,अधखुले छहरि छराके छोर छलकैँ ।भोर जग प्यारी अध ऊरध इतै की ओर ,भायी झिकि झिरकि उघारि अध पलकैं ।आँखै अधखुलीँ अधखुली खिरकी है खुली ,अधखुले आनन पै अधखुली अलकैँ ।
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