साहिर लुधियानवी
1921-1980
साहिर लुधियानवी एक लोकप्रिय शायर और हिन्दी फिल्मों के प्रसिद्ध गीतकार थे।
दीवान पढ़ें (Read Diwan)
Famous Works
यहाँ एक खिलौना है इंसां की हस्ती
ये बस्ती है मुर्दा-परस्तों की बस्ती
अक़ायद वहम है मज़हब ख़याल-ए-ख़ाम है साक़ी
अज़ल से ज़हन-ए-इन्सां बस्त-ए-औहाम है साक़ी
अगर मुझे न मिली तुम तो मैं ये समझूँगा
कि दिल की राह से होकर ख़ुशी नहीं गुज़री
अपना दिल पेश करूँ, अपनी वफ़ा पेश करूँ
कुछ समझ में नहीं आता तुझे क्या पेश करूँ
अपने माज़ी के तसव्वुर से हिरासा हूँ मैं
अपने गुज़रे हुए अय्यम से नफ़रत है मुझे
अब अगर हमसे ख़ुदाई भी खफ़ा हो जाए
गैर-मुमकिन है कि दिल दिल से जुदा हो जाए
अब आए या न आए इधर पूछते चलो
क्या चाहती है उनकी नज़र पूछते चलो
अब कोई गुलशन ना उजड़े अब वतन आज़ाद है
रूह गंगा की हिमालय का बदन आज़ाद है
अब वो करम करें कि सितम, मैं नशे में हूँ ।
मुझको न कोई होश न ग़म, मैं नशे में हूँ ।
अभी न जाओ छोड़ कर के दिल अभी भरा नहीं
अभी अभी तो आई हो अभी अभी तो
अहले-ए-दिल और भी हैं अहल-ए-वफ़ा और भी हैं
एक हम ही नहीं दुनिया से ख़फ़ा और भी हैं
आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते
वरना ये रात आज के संगीन दौर की
साथियो! मैंने बरसों तुम्हारे लिए
चाँद, तारों, बहारों के सपने बुने
साथीहरू, मैले वर्षौँ
तपाईँका लागि
आज की रात मुरादों की बरात आई है ।
आज की रात नहीं शिकवे-शिकायत के लिए,
आप आए तो ख़याल-ए-दिल-ए नाशाद आया
कितने भूले हुए ज़ख़्मों का पता याद आया
इतनी हसीन इतनी जवाँ रात, क्या करें
जागे हैं कुछ अजीब से जज़्बात, क्या करें ?
इश्क़ की गर्मी-ए-जज़्बात किसे पेश करूँ
ये सुलग़ते हुए दिन-रात किसे पेश करूँ
इस तरफ से गुज़रे थे काफ़िले बहारों के
आज तक सुलगते हैं ज़ख्म रहगुज़ारों के
इस रेशमी पाज़ेब की झंकार के सदके
जिस ने ये पहनाई है उस दिलदार के सदके
अब न इन ऊंचे मकानों में क़दम रक्खूंगा
मैंने इक बार ये पहले भी क़सम खाई थी
उड़ें जब जब ज़ुल्फ़ें तेरी
हो, उड़ें जब जब ज़ुल्फ़ें तेरी
मेरे नदीम मेरे हमसफ़र उदास न हो
कठिन सही तेरी मन्जिल मगर उदास न हो
उस मुल्क की सरहद को कोई छू नहीं सकता
जिस मुल्क की सरहद की निगेहबान है आँखें
तिरी तड़प से न तड़पा था मेरा दिल,लेकिन
तिरे सुकून से बेचैन हो गया हूँ मैं
कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है
कि ज़िन्दगी तेरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छाँव में
कभी ख़ुद पे, कभी हालात पे रोना आया ।
बात निकली तो हर एक बात पे रोना आया ॥
कह दूँ तुम्हें
या चुप रहूँ
कहना इक दीवाना तेरी
याद में आहें भरता है
कहिले काहीँ मलाई यस्तो लाग्छ
जिन्दगी तिम्रा केशको शीतल छायामा
ताज तेरे लिए इक मज़हर-ए-उलफत ही सही
तुम को इस वादी-ए-रँगीं से अक़ीदत ही सही
किस का रस्ता देखे, ऐ दिल, ऐ सौदाई
मीलों है खामोशी, बरसों है तनहाई
तुम्हें उदास सा पाता हूँ मैं काई दिन से
ना जाने कौन से सदमे उठा रही हो तुम
किसी पत्थर की मूरत से मुहब्बत का इरादा है
परस्तिश की तमन्ना है, इबादत का इरादा है
चन्द कलियाँ निशात की चुनकर
मुद्दतों मह्वे-यास रहता हूँ
कौन आया कि निगाहों में चमक जाग उठी,
दिल के सोए हुए तारों में खनक जाग उठी ।