ग़ज़ल
एक मुलाक़ात
तिरी तड़प से न तड़पा था मेरा दिल,लेकिनतिरे सुकून से बेचैन हो गया हूँ मैंये जान कर तुझे जाने कितना ग़म पहुचेंकि आज तेरे ख़यालों में खो गया हूँ मैं
किसी की हो के तू इस तरह मेरे घर आईकि जैसे फिर कभी आए तो घर मिले न मिलेनज़र उठाई, मगर ऐसी बे-यकीनी सेकि जिस तरह कोई पेशे-नज़र मिले न मिलेतू मुस्कुराई, मगर मुस्कुरा के रुक सी गईकि मुस्कुराने से ग़म की खबर मिले न मिलेरुकी तो ऐसे, कि जैसे तिरी रियाज़त कोअब इस समर से ज़ियादा समर मिले न मिलेगई तो सोग में डूबे क़दम ये कह के गएसफ़र है शर्त, शरीके-सफ़र मिले न मिले
तिरी तड़प से न तड़पा था मेरा दिल,लेकिनतिरे सुकून से बेचैन हो गया हूँ मैंये जान कर तुझे क्या जाने कितना ग़म पहुंचेकि आज तेरे ख़यालों में खो गया हूँ मैं
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