ग़ज़ल
आज की रात मुरादों की बरात आई है
आज की रात मुरादों की बरात आई है ।
आज की रात नहीं शिकवे-शिकायत के लिए,आज हर लम्हा हर इक पल है मोहब्बत के लिए,रेशमी सेज है महकी हुई तन्हाई है,आज की रात मुरादों की बरात आई है ।
हर गुनह आज मुक़द्दस है फ़रिश्तों की तरह,काँपते हाथों को मिल जाने दो रिश्तों की तरह,आज मिलने में न उलझन है न रुस्वाई है,आज की रात मुरादों की बरात आई है ।
अपनी ज़ुल्फ़ें मिरे शाने पे बिखर जाने दो,इस हसीं रात को कुछ और निखर जाने दो,सुब्ह ने आज न आने की क़सम खाई है,आज की रात मुरादों की बरात आई है ।
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh