ग़ज़ल

कभी कभी

साहिर लुधियानवी · सब कलाम देखें
कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है
कि ज़िन्दगी तेरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छाँव मेंगुज़रने पाती तो शादाब हो भी सकती थीये तीरगी जो मेरी ज़ीस्त का मुक़द्दर हैतेरी नज़र की शुआओं में खो भी सकती थी
अजब न था के मैं बेगाना-ए-अलम रह करतेरे जमाल की रानाईयों में खो रहतातेरा गुदाज़ बदन तेरी नीमबाज़ आँखेंइन्हीं हसीन फ़सानों में महव हो रहता
पुकारतीं मुझे जब तल्ख़ियाँ ज़माने कीतेरे लबों से हलावट के घूँट पी लेताहयात चीखती फिरती बरहना-सर, और मैंघनेरी ज़ुल्फ़ों के साये में छुप के जी लेता
मगर ये हो न सका और अब ये आलम हैके तू नहीं, तेरा ग़म, तेरी जुस्तजू भी नहींगुज़र रही है कुछ इस तरह ज़िन्दगी जैसेइसे किसी के सहारे की आरज़ू भी नहीं
ज़माने भर के दुखों को लगा चुका हूँ गलेगुज़र रहा हूँ कुछ अनजानी रह्गुज़ारों सेमहीब साये मेरी सम्त बढ़ते आते हैंहयात-ओ-मौत के पुरहौल ख़ारज़ारों से
न कोई जादह-ए-मंज़िल न रौशनी का सुराग़भटक रही है ख़लाओं में ज़िन्दगी मेरीइन्हीं ख़लाओं में रह जाऊँगा कभी खोकरमैं जानता हूँ मेरी हमनफ़स मगर फिर भी
कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है...................................................................
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