ग़ज़ल
अपना दिल पेश करूँ, अपनी वफ़ा पेश करूँ
अपना दिल पेश करूँ, अपनी वफ़ा पेश करूँकुछ समझ में नहीं आता तुझे क्या पेश करूँअपना दिल पेश करूँ...
तेरे मिलने की ख़ुशी में कोई नग़मा छेड़ूँया तेरे दर्द-ए-जुदाई का गिला पेश करूँकुछ समझ में नहीं...
मेरे ख़्वाबों में भी तू, मेरे ख़यालों में भी तूकौन-सी चीज़ तुझे तुझसे जुदा पेश करूँकुछ समझ में नहीं...
जो तेरे दिल को लुभाए वो अदा मुझमें नहींक्यों न तुझको कोई तेरी ही अदा पेश करूँकुछ समझ में नहीं...
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