ग़ज़ल

कहीं और मिला कर मुझसे

साहिर लुधियानवी · सब कलाम देखें
ताज तेरे लिए इक मज़हर-ए-उलफत ही सहीतुम को इस वादी-ए-रँगीं से अक़ीदत ही सहीमेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझसे
बज़्म-ए-शाही में ग़रीबों का गुज़र क्या मानीसब्त जिस राह पे हों सतवत-ए-शाही के निशाँउस पे उलफत भरी रूहों का सफर क्या मानी
मेरी महबूब पस-ए-पर्दा-ए-तशरीर-ए-वफ़ातूने सतवत के निशानों को तो देखा होतामुर्दा शाहों के मक़ाबिर से बहलने वाली,अपने तारीक़ मक़ानों को तो देखा होता
अनगिनत लोगों ने दुनिया में मुहब्बत की हैकौन कहता है कि सादिक़ न थे जज़्बे उनकेलेकिन उनके लिये तश्शीर का सामान नहींक्यूँकि वो लोग भी अपनी ही तरह मुफ़लिस थे
ये इमारत-ओ-मक़ाबिर, ये फ़ासिले, ये हिसारमुतल-क़ुलहुक्म शहँशाहों की अज़्मत के सुतूनदामन-ए-दहर पे उस रँग की गुलकारी हैजिसमें शामिल है तेरे और मेरे अजदाद का ख़ून
मेरी महबूब! उनहें भी तो मुहब्बत होगीजिनकी सानाई ने बक़शी है इसे शक़्ल-ए-जमीलउनके प्यारों के मक़ाबिर रहे बेनाम-ओ-नमूदआज तक उन पे जलाई न किसी ने क़ँदील
ये चमनज़ार ये जमुना का किनारा, ये महलये मुनक़्कश दर-ओ-दीवार, ये महराब ये ताक़इक शहँशाह ने दौलत का सहारा ले करहम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझसे
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