ग़ज़ल
अब कोई गुलशन ना उजड़े
अब कोई गुलशन ना उजड़े अब वतन आज़ाद हैरूह गंगा की हिमालय का बदन आज़ाद है
खेतियाँ सोना उगाएँ, वादियाँ मोती लुटाएँआज गौतम की ज़मीं, तुलसी का बन आज़ाद है
मंदिरों में शंख बाजे, मस्जिदों में हो अज़ाँशेख का धर्म और दीन-ए-बरहमन आज़ाद है
लूट कैसी भी हो अब इस देश में रहने न पाएआज सबके वास्ते धरती का धन आज़ाद है
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