ग़ज़ल
किसी पत्थर की मूरत से मुहब्बत का इरादा है
किसी पत्थर की मूरत से मुहब्बत का इरादा हैपरस्तिश की तमन्ना है, इबादत का इरादा हैकिसी पत्थर की मूरत से ...
जो दिल की धड़कनें समझे न आँखों की ज़ुबाँ समझेनज़र की गुफ़्तगू समझे न जज़बों का बयाँ समझेउसी के सामने उसकी शिक़ायत का इरादा हैकिसी पत्थर की मूरत से ...
मुहब्बत बेरुख़ी से और भड़केगी वो क्या जानेतबीयत इस अदा पे और फड़केगी वो क्या जानेवो क्या जाने कि अपना किस क़यामत का इरादा हैकिसी पत्थर की मूरत से ...
सुना है हर जवाँ पत्थर के दिल में आग होती हैमगर जब तक न छेड़ो, शर्म के पर्दे में सोती हैये सोचा है की दिल की बात उसके रूबरू कह देनतीजा कुच भी निकले आज अपनी आरज़ू कह देहर इक बेजाँ तक़ल्लुफ़ से बग़ावत का इरादा हैकिसी पत्थर की मूरत से ...
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