ग़ज़ल
कुछ कत'ए
चन्द कलियाँ निशात की चुनकरमुद्दतों मह्वे-यास रहता हूँतेरा मिलना ख़ुशी की बात सहीतुझ से मिल कर उदास रहता हूँ*तपते दिल पर यूं गिरती हैतेरी नज़र से प्यार की शबनमजलते हुए जंगल पर जैसेबरखा बरसे रुक-रुक, थम-थम*जहाँ-जहाँ तेरी नज़र की ओस टपकी थीवहां-वहां से अभी तक ग़ुबार उठता हैजहाँ-जहाँ तेरे जल्वों के फूल बिखरे थेवहां-वहां दिले-वहशी पुकार उठता है*न मुंह छुपा के जिए हम,न सर झुका के जिएसितमगरों की नज़र से नज़र मिला के जिएअब एक रात अगर कम जिए,तो कम ही सहीयही बहुत है कि हम मश्अलें जला के जिए
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