ग़ज़ल
अहले-दिल और भी हैं
अहले-ए-दिल और भी हैं अहल-ए-वफ़ा और भी हैंएक हम ही नहीं दुनिया से ख़फ़ा और भी हैं
हम पे ही ख़त्म नहीं मस्लक-ए-शोरीदासरीचाक दिल और भी हैं चाक क़बा और भी हैं
क्या हुआ गर मेरे यारों की ज़ुबानें चुप हैंमेरे शाहिद मेरे यारों के सिवा और भी हैं
सर सलामत है तो क्या संग-ए-मलामत की कमीजान बाकी है तो पैकान-ए-कज़ा और भी हैं
मुंसिफ़-ए-शहर की वहदत पे न हर्फ़ आ जायेलोग कहते हैं कि अरबाब-ए-जफ़ा और भी हैं
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