ग़ज़ल
आओ कि कोई ख़्वाब बुनें
आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्तेवरना ये रात आज के संगीन दौर कीडस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे कि जान-ओ-दिलता-उम्र फिर न कोई हसीं ख़्वाब बुन सकें
गो हम से भागती रही ये तेज़-गाम उम्रख़्वाबों के आसरे पे कटी है तमाम उम्र
ज़ुल्फ़ों के ख़्वाब, होंठों के ख़्वाब, और बदन के ख़्वाबमेराज-ए-फ़न के ख़्वाब, कमाल-ए-सुख़न के ख़्वाब
तहज़ीब-ए-ज़िन्दगी के, फ़रोग़-ए-वतन के ख़्वाबज़िन्दाँ के ख़्वाब, कूचा-ए-दार-ओ-रसन के ख़्वाब
ये ख़्वाब ही तो अपनी जवानी के पास थेये ख़्वाब ही तो अपने अमल के असास थेये ख़्वाब मर गये हैं तो बे-रंग है हयातयूँ है कि जैसे दस्त-ए-तह-ए-सन्ग है हयात
आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्तेवरना ये रात आज के संगीन दौर कीडस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे कि जान-ओ-दिलता-उम्र फिर न कोई हसीं ख़्वाब बुन सकें
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