सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

1896-1961
दीवान पढ़ें (Read Diwan)

Famous Works

अट नहीं रही हैआभा फागुन की तन
जब कड़ी मारें पड़ीं, दिल हिल गयापर न कर चूँ भी, कभी पाया यहाँ;
अभी न होगा मेरा अन्तअभी-अभी ही तो आया है
आज प्रथम गाई पिक पञ्चम।गूंजा है मरु विपिन मनोरम।
आज प्रथम गाई पिक पंचम।गूंजा है मरु विपिन मनोरम।
:::(गीत)::बादल, गरजो!--
आज ठंडक अधिक है।बाहर ओले पड़ चुके हैं,
केशर की, कलि की पिचकारीःपात-पात की गात सँवारी ।
युवकजनों की है जान ;ख़ून की होली जो खेली ।
खेलूँगी कभी न होलीउससे जो नहीं हमजोली ।
गर्म पकौड़ी-ऐ गर्म पकौड़ी,
गहन है यह अंधकारा;स्वार्थ के अवगुंठनों से
गीत गाने दो मुझे तो,वेदना को रोकने को।
लहर रही शशिकिरण चूम निर्मल यमुनाजल,चूम सरित की सलिल राशि खिल रहे कुमुद दल
जागो फिर एक बार!प्यार जगाते हुए हारे सब तारे तुम्हें
टूटें सकल बन्धकलि के, दिशा-ज्ञान-गत हो बहे गन्ध।
तुम तुंग - हिमालय - श्रृंगऔर मैं चंचल-गति सुर-सरिता।
नहीं मालूम क्यों यहाँ आयाठोकरें खाते हु‌ए दिन बीते।
दलित जन पर करो करुणा।दीनता पर उतर आये
सह जाते होउत्पीड़न की क्रीड़ा सदा निरंकुश नग्न,
नयनों के डोरे लाल-गुलाल भरे, खेली होली !जागी रात सेज प्रिय पति सँग रति सनेह-रँग घोली,
बीत चुका शीत, दिन वैभव का दीर्घतरडूब चुका पश्चिम में, तारक-प्रदीप-कर
पत्रोत्कंठित जीवन का विष बुझा हुआ है,आज्ञा का प्रदीप जलता है हृदय-कुंज में,
अंचल के चंचल क्षुद्र प्रपात !मचलते हुए निकल आते हो;
तुम्हें खोजता था मैं,पा नहीं सका,
(प्रिय) यामिनी जागी।अलस पंकज-दृग अरुण-मुख
एक दिन विष्‍णुजी के पास गए नारद जी,पूछा, "मृत्‍युलोक में कौन है पुण्‍यश्‍यलोक
घेर अंग-अंग कोलहरी तरंग वह प्रथम तारुण्य की,
बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु!पूछेगा सारा गाँव, बंधु!
बापू, तुम मुर्गी खाते यदितो क्या भजते होते तुमको
भर देते होबार-बार, प्रिय, करुणा की किरणों से
भारति, जय, विजय करेकनक-शस्य-कमल धरे!
भेद कुल खुल जाए वह सूरत हमारे दिल में है ।देश को मिल जाए जो पूँजी तुम्हारी मिल में है ।।
मद - भरे ये नलिन - नयनमलीन हैं;अल्प - जल में या विकल लघु मीन हैं?
मरा हूँ हजार मरणपाई तब चरण-शरण ।
नर जीवन के स्वार्थ सकलबलि हों तेरे चरणों पर, माँ
मानव जहाँ बैल घोड़ा है,कैसा तन-मन का जोड़ा है ।
मार दी तुझे पिचकारी,कौन री, रँगी छबि यारी ?
रँग गई पग-पग धन्य धरा,---हुई जग जगमग मनोहरा ।
राजे ने अपनी रखवाली की;किला बनाकर रहा;
माँ उसको कहती है रानीआदर से, जैसा है नाम;
लू के झोंकों झुलसे हुए थे जो,भरा दौंगरा उन्ही पर गिरा।
:::वर्ष का प्रथमपृथ्वी के उठे उरोज मंजु पर्वत निरुपम