ग़ज़ल

प्राप्ति

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' · सब कलाम देखें
तुम्हें खोजता था मैं,पा नहीं सका,हवा बन बहीं तुम, जबमैं थका, रुका ।
मुझे भर लिया तुमने गोद में,कितने चुम्बन दिये,मेरे मानव-मनोविनोद मेंनैसर्गिकता लिये;
सूखे श्रम-सीकर वेछबि के निर्झर झरे नयनों से,शक्त शिरा‌एँ हु‌ईं रक्त-वाह ले,मिलीं - तुम मिलीं, अन्तर कह उठाजब थका, रुका ।
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.