ग़ज़ल

तुम हमारे हो

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' · सब कलाम देखें
नहीं मालूम क्यों यहाँ आयाठोकरें खाते हु‌ए दिन बीते।उठा तो पर न सँभलने पायागिरा व रह गया आँसू पीते।
ताब बेताब हु‌ई हठ भी हटीनाम अभिमान का भी छोड़ दिया।देखा तो थी माया की डोर कटीसुना वह कहते हैं, हाँ खूब किया।
पर अहो पास छोड़ आते हीवह सब भूत फिर सवार हु‌ए।मुझे गफलत में ज़रा पाते हीफिर वही पहले के से वार हु‌ए।
एक भी हाथ सँभाला न गयाऔर कमज़ोरों का बस क्या है।कहा - निर्दय, कहाँ है तेरी दया,मुझे दुख देने में जस क्या है।
रात को सोते यह सपना देखाकि वह कहते हैं "तुम हमारे होभला अब तो मुझे अपना देखा,कौन कहता है कि तुम हारे हो।
अब अगर को‌ई भी सताये तुम्हेंतो मेरी याद वहीं कर लेनानज़र क्यों काल ही न आये तुम्हेंप्रेम के भाव तुरत भर लेना"।
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