ग़ज़ल

भारती वन्दना

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' · सब कलाम देखें
भारति, जय, विजय करेकनक-शस्य-कमल धरे!
लंका पदतल-शतदलगर्जितोर्मि सागर-जलधोता शुचि चरण-युगलस्तव कर बहु अर्थ भरे!
तरु-तण वन-लता-वसनअंचल में खचित सुमनगंगा ज्योतिर्जल-कणधवल-धार हार लगे!
मुकुट शुभ्र हिम-तुषारप्राण प्रणव ओंकारध्वनित दिशाएँ उदारशतमुख-शतरव-मुखरे!
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