ग़ज़ल
ख़ून की होली जो खेली
युवकजनों की है जान ;ख़ून की होली जो खेली ।पाया है लोगों में मान,ख़ून की होली जो खेली ।
रँग गये जैसे पलाश;कुसुम किंशुक के, सुहाए,कोकनद के पाए प्राण,ख़ून की होली जो खेली ।
निकले क्या कोंपल लाल,फाग की आग लगी है,फागुन की टेढ़ी तान,ख़ून की होली जो खेली ।
खुल गई गीतों की रात,किरन उतरी है प्रात की ;-हाथ कुसुम-वरदान,ख़ून की होली जो खेली ।
आई सुवेश बहार,आम-लीची की मंजरी;कटहल की अरघान,ख़ून की होली जो खेली ।
विकच हुए कचनार,हार पड़े अमलतास के ;पाटल-होठों मुसकान,ख़ून की होली जो खेली ।
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.