ग़ज़ल
केशर की कलि की पिचकारी
केशर की, कलि की पिचकारीःपात-पात की गात सँवारी ।
राग-पराग-कपोल किए हैं,लाल-गुलाल अमोल लिए हैंतरू-तरू के तन खोल दिए हैं,आरती जोत-उदोत उतारी-गन्ध-पवन की धूप धवारी ।
गाए खग-कुल-कण्ठ गीत शत,संग मृदंग तरंग-तीर-हतभजन-मनोरंजन-रत अविरत,राग-राग को फलित किया री-विकल-अंग कल गगन विहारी ।
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