ग़ज़ल

मानव जहाँ बैल घोड़ा है

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' · सब कलाम देखें
मानव जहाँ बैल घोड़ा है,कैसा तन-मन का जोड़ा है ।
किस साधन का स्वांग रचा यह,किस बाधा की बनी त्वचा यह ।देख रहा है विज्ञ आधुनिक,वन्य भाव का यह कोड़ा है ।
इस पर से विश्वास उठ गया,विद्या से जब मैल छुट गयापक-पक कर ऐसा फूटा है,जैसे सावन का फोड़ा है ।
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh