ग़ज़ल
रँग गई पग-पग धन्य धरा
रँग गई पग-पग धन्य धरा,---हुई जग जगमग मनोहरा ।
वर्ण गन्ध धर, मधु मरन्द भर,तरु-उर की अरुणिमा तरुणतरखुली रूप - कलियों में पर भरस्तर स्तर सुपरिसरा ।
गूँज उठा पिक-पावन पंचमखग-कुल-कलरव मृदुल मनोरम,सुख के भय काँपती प्रणय-क्लम
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