ग़ज़ल

मरा हूँ हज़ार मरण

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' · सब कलाम देखें
मरा हूँ हजार मरणपाई तब चरण-शरण ।
फैला जो तिमिर जालकट-कटकर रहा काल,आँसुओं के अंशुमाल,पड़े अमित सिताभरण ।
जल-कलकल-नाद बढ़ाअन्तर्हित हर्ष कढ़ा,विश्व उसी को उमड़ा,हुए चारु-करण सरण ।
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.