ग़ज़ल

खेलूँगी कभी न होली

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' · सब कलाम देखें
खेलूँगी कभी न होलीउससे जो नहीं हमजोली ।
यह आँख नहीं कुछ बोली,यह हुई श्याम की तोली,ऐसी भी रही ठठोली,गाढ़े रेशम की चोली-
अपने से अपनी धो लो,अपना घूँघट तुम खोलो,अपनी ही बातें बोलो,मैं बसी पराई टोली ।
जिनसे होगा कुछ नाता,उनसे रह लेगा माथा,उनसे हैं जोडूँ-जाता,मैं मोल दूसरे मोली
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