ग़ज़ल

जागो फिर एक बार

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' · सब कलाम देखें
जागो फिर एक बार!प्यार जगाते हुए हारे सब तारे तुम्हेंअरुण-पंख तरुण-किरणखड़ी खोलती है द्वार-जागो फिर एक बार!
आँखे अलियों-सीकिस मधु की गलियों में फँसी,बन्द कर पाँखेंपी रही हैं मधु मौनअथवा सोयी कमल-कोरकों में?-बन्द हो रहा गुंजार-जागो फिर एक बार!
अस्ताचल चले रवि,शशि-छवि विभावरी मेंचित्रित हुई है देखयामिनीगन्धा जगी,एकटक चकोर-कोर दर्शन-प्रिय,आशाओं भरी मौन भाषा बहु भावमयीघेर रहा चन्द्र को चाव सेशिशिर-भार-व्याकुल कुलखुले फूल झूके हुए,आया कलियों में मधुरमद-उर-यौवन उभार-जागो फिर एक बार!
पिउ-रव पपीहे प्रिय बोल रहे,सेज पर विरह-विदग्धा वधूयाद कर बीती बातें, रातें मन-मिलन कीमूँद रही पलकें चारुनयन जल ढल गये,लघुतर कर व्यथा-भारजागो फिर एक बार!
सहृदय समीर जैसेपोछों प्रिय, नयन-नीरशयन-शिथिल बाहेंभर स्वप्निल आवेश में,आतुर उर वसन-मुक्त कर दो,सब सुप्ति सुखोन्माद हो,छूट-छूट अलसफैल जाने दो पीठ परकल्पना से कोमनऋतु-कुटिल प्रसार-कामी केश-गुच्छ।तन-मन थक जायें,मृदु सरभि-सी समीर मेंबुद्धि बुद्धि में हो लीनमन में मन, जी जी में,एक अनुभव बहता रहेउभय आत्माओं मे,कब से मैं रही पुकारजागो फिर एक बार!
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