ग़ज़ल
मद भरे ये नलिन
मद - भरे ये नलिन - नयनमलीन हैं;अल्प - जल में या विकल लघु मीन हैं?या प्रतीक्षा में किसी की शर्वरी;बीत जाने पर हुये ये दीन हई?
या पथिक से लोल - लोचन! कह रहे-"हम तपस्वी हैं, सभी दुख सह रहे।गिन रहे दिन ग्रीष्म - वर्षा - शीत के;काल -ताल- तरंग में हम बह रहे।
मौन हैं, पर पतन में- उत्थान में ,वेणु - वर - वादन -निरत - विभु गान मेंहै छिपा जो मर्म उसका, समझते;किन्तु फिर भी हैं उसी के ध्यान में।
आह! कितने विकल-जन-मन मिल चुके;हिल चुके, कितने हृदय हैं खिल चुके।तप चुके वे प्रिय - व्यथा की आंच में;दुःख उन अनुरागियों के झिल चुके।
क्यों हमारे ही लिये वे मौन हैं?पथिक, वे कोमल कुसुम हैं-कौन हैं?"
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh