ग़ज़ल

दीन

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' · सब कलाम देखें
सह जाते होउत्पीड़न की क्रीड़ा सदा निरंकुश नग्न,हृदय तुम्हारा दुबला होता नग्न,अन्तिम आशा के कानों मेंस्पन्दित हम - सबके प्राणों मेंअपने उर की तप्त व्यथाएँ,क्षीण कण्ठ की करुण कथाएँकह जाते होऔर जगत की ओर ताककरदुःख हृदय का क्षोभ त्यागकर,सह जाते हो।कह जातेहो-"यहाँकभी मत आना,उत्पीड़न का राज्य दुःख ही दुःखयहाँ है सदा उठाना,क्रूर यहाँ पर कहलाता है शूर,और हृदय का शूर सदा ही दुर्बल क्रूर;स्वार्थ सदा ही रहता परार्थ से दूर,यहाँ परार्थ वही, जो रहेस्वार्थ से हो भरपूर,जगतकी निद्रा, है जागरण,और जागरण जगत का - इस संसृति काअन्त - विराम - मरणअविराम घात - आघातआह ! उत्पात!यही जग - जीवन के दिन-रात।यही मेरा, इनका, उनका, सबका स्पन्दन,हास्य से मिला हुआ क्रन्दन।यही मेरा, इनका, उनका, सबका जीवन,दिवस का किरणोज्ज्वल उत्थान,रात्रि की सुप्ति, पतन;दिवस की कर्म - कुटिल तम - भ्रान्तिरात्रि का मोह, स्वप्न भी भ्रान्ति,सदा अशान्ति!"
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