ग़ज़ल

राजे ने अपनी रखवाली की

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' · सब कलाम देखें
राजे ने अपनी रखवाली की;किला बनाकर रहा;बड़ी-बड़ी फ़ौजें रखीं ।चापलूस कितने सामन्त आए ।मतलब की लकड़ी पकड़े हुए ।कितने ब्राह्मण आएपोथियों में जनता को बाँधे हुए ।कवियों ने उसकी बहादुरी के गीत गाए,लेखकों ने लेख लिखे,ऐतिहासिकों ने इतिहास के पन्ने भरे,नाट्य-कलाकारों ने कितने नाटक रचेरंगमंच पर खेले ।जनता पर जादू चला राजे के समाज का ।लोक-नारियों के लिए रानियाँ आदर्श हुईं ।धर्म का बढ़ावा रहा धोखे से भरा हुआ ।लोहा बजा धर्म पर, सभ्यता के नाम पर ।ख़ून की नदी बही ।आँख-कान मूंदकर जनता ने डुबकियाँ लीं ।आँख खुली-- राजे ने अपनी रखवाली की ।
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh