ग़ज़ल

गहन है यह अंधकारा

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' · सब कलाम देखें
गहन है यह अंधकारा;स्वार्थ के अवगुंठनों सेहुआ है लुंठन हमारा।
खड़ी है दीवार जड़ की घेरकर,बोलते है लोग ज्यों मुँह फेरकरइस गगन में नहीं दिनकर;नही शशधर, नही तारा।
कल्पना का ही अपार समुद्र यह,गरजता है घेरकर तनु, रुद्र यह,कुछ नही आता समझ मेंकहाँ है श्यामल किनारा।
प्रिय मुझे वह चेतना दो देह की,याद जिससे रहे वंचित गेह की,खोजता फिरता न पाता हुआ,मेरा हृदय हारा।
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh