ग़ज़ल
अध्यात्म फल (जब कड़ी मारें पड़ीं)
जब कड़ी मारें पड़ीं, दिल हिल गयापर न कर चूँ भी, कभी पाया यहाँ;मुक्ति की तब युक्ति से मिल खिल गयाभाव, जिसका चाव है छाया यहाँ।
खेत में पड़ भाव की जड़ गड़ गयी,धीर ने दुख-नीर से सींचा सदा,सफलता की थी लता आशामयी,झूलते थे फूल-भावी सम्पदा।
दीन का तो हीन ही यह वक्त है,रंग करता भंग जो सुख-संग काभेद कर छेद पाता रक्त हैराज के सुख-साज-सौरभ-अंग का।
काल की ही चाल से मुरझा गयेफूल, हूले शूल जो दुख मूल मेंएक ही फल, किन्तु हम बल पा गये;प्राण है वह, त्राण सिन्धु अकूल में।
मिष्ट है, पर इष्ट उनका है नहींशिष्ट पर न अभीष्ट जिनका नेक है,स्वाद का अपवाद कर भरते मही,पर सरस वह नीति - रस का एक है।
''( कविता संग्रह, "परिमल" से )''
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