नागार्जुन
1911-1998
नागार्जुन (बैद्यनाथ मिश्र) हिन्दी और मैथिली के जनकवि थे, जिनकी कविताएँ जनसंघर्ष और सामाजिक यथार्थ की तीखी अभिव्यक्ति के लिए प्रसिद्ध हैं।
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Famous Works
कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास
अग्निबीज
तुमने बोए थे
सीधे-सादे शब्द हैं, भाव बडे ही गूढ़
अन्न-पचीसी घोख ले, अर्थ जान ले मूढ़
अपने खेत में....
जनवरी का प्रथम सप्ताह
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी,
यही हुई है राय जवाहरलाल की
'स्वेत-स्याम-रतनार' अँखिया निहार के
सिण्डकेटी प्रभुओं की पग-धूर झार के
क्या नहीं है
इन घुच्ची आँखों में
उषा की लाली में
अभी से गए निखर
अभी कल तक
गालियॉं देती तुम्हें
काले-काले ऋतु-रंग
काली-काली घन-घटा
वो गया
वो गया
खुब गए
दूधिया निगाहों में
प्राइवेट बस का ड्राइवर है तो क्या हुआ,
सात साल की बच्ची का पिता तो है!
नभ में चौकडियाँ भरें भले
शिशु घन-कुरंग
पूरी स्पीड में है ट्राम
खाती है दचके पै दचके
चंदू, मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हिरनौटा
चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से हूँ पटना लौटा
पेट-पेट में आग लगी है, घर-घर में है फाका
यह भी भारी चमत्कार है, काँग्रेसी महिमा का
जंगल में
लगी रही आग
कवि केदारनाथ अग्रवाल के लिए
हंसते-हंसते, बातें करते
गीली भादों
रैन अमावस
जी हाँ, लिख रहा हूँ ...
बहुत कुछ ! बहोत बहोत !!
जो नहीं हो सके पूर्ण-काम
मैं उनको करता हूँ प्रणाम ।
झुकी पीठ को मिला
किसी हथेली का स्पर्श
बापू के भी ताऊ निकले तीनों बन्दर बापू के!
सरल सूत्र उलझाऊ निकले तीनों बन्दर बापू के!
ध्यामग्न
वक-शिरोमणि
दो हज़ार मन गेहूँ आया दस गाँवों के नाम
राधे चक्कर लगा काटने, सुबह हो गई शाम
भुक्खड़ के हाथों में यह बन्दूक कहाँ से आई
एस० डी० ओ० की गुड़िया बीबी सपने में घिघियाई
बाल झबरे, दृष्टि पैनी, फटी लुंगी नग्न तन
किन्तु अन्तर्दीप्त था आकाश-सा उन्मुक्त मन
जिनके बूटों से कीलित है, भारत माँ की छाती
जिनके दीपों में जलती है, तरुण आँत की बाती
प्रतिबद्ध हूँ
संबद्ध हूँ
"ओ रे प्रेत -"
कडककर बोले नरक के मालिक यमराज
एक की नहीं,
दो की नहीं,
जाने, किधर से
चुपचाप आकर
फूले कदंब
टहनी-टहनी में कन्दुक सम झूले कदंब