ग़ज़ल
उषा की लाली
उषा की लाली मेंअभी से गए निखरहिमगिरि के कनक शिखर !
आगे बढ़ा शिशु रविबदली छवि, बदली छविदेखता रह गया अपलक कविडर था, प्रतिपलअपरूप यह जादुई आभाजाए ना बिखर, जाए ना बिखर...
उषा की लाली मेंभले हो उठे थे निखरहिमगिरि के कनक शिखर !
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh