ग़ज़ल
गुलाबी चूड़ियाँ
प्राइवेट बस का ड्राइवर है तो क्या हुआ,सात साल की बच्ची का पिता तो है!सामने गियर से उपरहुक से लटका रक्खी हैंकाँच की चार चूड़ियाँ गुलाबीबस की रफ़्तार के मुताबिकहिलती रहती हैं…झुककर मैंने पूछ लियाखा गया मानो झटकाअधेड़ उम्र का मुच्छड़ रोबीला चेहराआहिस्ते से बोला: हाँ सा’बलाख कहता हूँ नहीं मानती मुनियाटाँगे हुए है कई दिनों सेअपनी अमानतयहाँ अब्बा की नज़रों के सामनेमैं भी सोचता हूँक्या बिगाड़ती हैं चूड़ियाँकिस ज़ुर्म पे हटा दूँ इनको यहाँ से?और ड्राइवर ने एक नज़र मुझे देखाऔर मैंने एक नज़र उसे देखाछलक रहा था दूधिया वात्सल्य बड़ी-बड़ी आँखों मेंतरलता हावी थी सीधे-साधे प्रश्न परऔर अब वे निगाहें फिर से हो गईं सड़क की ओरऔर मैंने झुककर कहा -हाँ भाई, मैं भी पिता हूँवो तो बस यूँ ही पूछ लिया आपसेवरना किसे नहीं भाँएगी?नन्हीं कलाइयों की गुलाबी चूड़ियाँ!
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