ग़ज़ल
जो नहीं हो सके पूर्ण-काम
जो नहीं हो सके पूर्ण-काममैं उनको करता हूँ प्रणाम ।
कुछ कुण्ठित औ' कुछ लक्ष्य-भ्रष्टजिनके अभिमन्त्रित तीर हुए;रण की समाप्ति के पहले हीजो वीर रिक्त तूणीर हुए !उनको प्रणाम !
जो छोटी-सी नैया लेकरउतरे करने को उदधि-पार;मन की मन में ही रही¸ स्वयँहो गए उसी में निराकार !उनको प्रणाम !
जो उच्च शिखर की ओर बढ़ेरह-रह नव-नव उत्साह भरे;पर कुछ ने ले ली हिम-समाधिकुछ असफल ही नीचे उतरे !उनको प्रणाम !
एकाकी और अकिंचन होजो भू-परिक्रमा को निकले;हो गए पँगु, प्रति-पद जिनकेइतने अदृष्ट के दाव चले !उनको प्रणाम !
कृत-कृत नहीं जो हो पाए;प्रत्युत फाँसी पर गए झूलकुछ ही दिन बीते हैं¸ फिर भीयह दुनिया जिनको गई भूल !उनको प्रणाम !
थी उम्र साधना, पर जिनकाजीवन नाटक दुखान्त हुआ;
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