ग़ज़ल
घिन तो नहीं आती है
पूरी स्पीड में है ट्रामखाती है दचके पै दचकेसटता है बदन से बदनपसीने से लथपथ ।छूती है निगाहों कोकत्थई दांतों की मोटी मुस्कानबेतरतीब मूँछों की थिरकनसच सच बतलाओघिन तो नहीं आती है?जी तो नहीं कढता है?
कुली मज़दूर हैंबोझा ढोते हैं, खींचते हैं ठेलाधूल धुआँ भाप से पड़ता है साबकाथके मांदे जहाँ तहाँ हो जाते हैं ढेरसपने में भी सुनते हैं धरती की धड़कनआकर ट्राम के अन्दर पिछले डब्बे मैंबैठ गए हैं इधर उधर तुमसे सट करआपस मैं उनकी बतकहीसच सच बतलाओजी तो नहीं कढ़ता है?घिन तो नहीं आती है?
दूध-सा धुला सादा लिबास है तुम्हारानिकले हो शायद चौरंगी की हवा खानेबैठना है पंखे के नीचे, अगले डिब्बे मैंये तो बस इसी तरहलगाएंगे ठहाके, सुरती फाँकेंगेभरे मुँह बातें करेंगे अपने देस कोस कीसच सच बतलाओअखरती तो नहीं इनकी सोहबत?जी तो नहीं कुढता है?घिन तो नहीं आती है?
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